देहरादून : देहरादून की जीवनरेखा कही जाने वाली रिस्पना नदी के किनारे बसे 114 परिवारों को सुरक्षित आवास में स्थानांतरित करने की पहल को केवल “नोटिस” के चश्मे से नहीं, बल्कि जनसुरक्षा और सुव्यवस्थित शहरी विकास के दृष्टिकोण से देखना चाहिए। मसूरी–देहरादून विकास प्राधिकरण (एमडीडीए) ने जिस स्पष्टता और संवेदनशीलता के साथ यह कदम उठाया है, वह बताता है कि प्रशासन अब केवल कागजी कार्रवाई तक सीमित नहीं है, बल्कि जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान कर ठोस समाधान दे रहा है।
उपाध्यक्ष बंशीधर तिवारी ने बिल्कुल सही कहा कि बाढ़ संभावित क्षेत्र में निवास करने वाले परिवार हर वर्ष बारिश के मौसम में असुरक्षा की आशंका के साथ जीते हैं। ऐसे में देहरादून नगर निगम द्वारा निर्मित फ्लैट्स में इन परिवारों को बसाना एक मानवीय और दूरदर्शी निर्णय है। महत्वपूर्ण यह है कि पहले आवास बनाए गए, आवंटन किया गया, बार-बार संवाद किया गया। उसके बाद अंतिम नोटिस जारी हुआ। यह प्रक्रिया दर्शाती है कि प्रशासन का उद्देश्य टकराव नहीं, बल्कि सुरक्षित पुनर्वास है।
साथ ही, रिस्पना तट को ग्रीन एरिया के रूप में विकसित करने की योजना राजधानी के पर्यावरणीय संतुलन के लिए अत्यंत आवश्यक है। इससे न केवल भविष्य में अतिक्रमण रुकेगा, बल्कि शहर को एक स्वच्छ और हरित फेफड़ा भी मिलेगा। दरअसल, यह कदम “विकास बनाम विस्थापन” की बहस से आगे बढ़कर “सुरक्षा, सुव्यवस्था और सतत विकास” की दिशा में एक सकारात्मक पहल है। जिसकी सराहना होनी चाहिए।

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