November 28, 2022

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पाती नंदा

उत्तराखंड में मनाया गई नन्दा अष्टमी (पाती) उत्सव, जाने मान्यता..

(उत्तराखंड जन): नंदा अष्टमी के मौके पर बुधवार को पाती का त्यौहार मनाया गया। नंदा पाती के अवसर पर भगवती नंदा देवी मंदिरों में पूजा-अर्चना की गई। इस दौरान ध्याणियों (गांव की महिलाओं) ने नंदा को नए अनाज का भोग लगाया। गढ़-कुमाऊं का पारंपरिक और श्रृद्धा आधारित यह त्यौहार भादो महीने की अष्टमी के अवसर पर आता है। यह अष्टमी ईष्ट देवी व ध्याण मां नंदा को समर्पित है। 12 वर्षो में जब नंदा राजजात यात्रा का आयोजन मां नंदा के मायके विदाई के रूप में होता है तो सावन भादो के ही इन्ही जलामग्न महीनों में होती है। यह पर्व सांकेतिक रूप से माँ नन्दा के मायके आगमन व कैलास विदाई का एक पर्व है।

बेटी (ध्याण) नंदा को किया विदा

अगस्त माह में होने वाले नंदा देवी मेले, जिसे स्थानीय भाषा में नंदा पाती या पातविड़ा कहा जाता है। गांव के ग्रामीण नंदा को अपनी बेटी (ध्याण) मानते हैं। पाती मेले के तहत ग्रामीण हिमालय से नंदा को बुलाकर 12 दिनों तक उसकी पूजा अर्चना करते हैं। 12वें दिन नंदाष्टमी के दिन देवी को विदा किया जाता है। इन 12 दिनों तक नंदा के जागर गाकर उसका आह्वाहन होता है। कुमाऊं और गढ़वाल में कुछ-कुछ क्षेत्रों के निवासी अपने गांव को मां नंदा के मायके (मां नंदा के रिश्तेदार) के रूप में मानते हैं। मां को अपनी बेटी, अपनी ध्याण के रूप में मानते हैं और एक बेटी, एक बहन की तरह ही आज के दिन मां भगवती को उनके ससुराल के लिए बहुत ही भावुक पूर्ण माहौल में अपने ना थमते हुए आंसुओ के बीच विदा करते हैं।

कई क्षेत्रों में पाती कुकड़ी-माकुडी के रूप में मनाई

कई गांवों में नन्दा अष्टमी को मनाए जाने वाले पाती उत्सव को कुकड़ी-माकुडी भी कहते है। कुकड़ी माकुडी में कुंणजे(एक पवित्र पहाड़ी पौधे) को इकट्ठा करके मां भगवती का स्वरूप प्रदान किया गया। फिर गाँव के लोगों द्वारा देवी के देवथान पहुंचने के गीत गाये गये। ग्रामीण साटी(धान) धोकर लाई, ढोल-दमाऊं बाजे भुंकारों के साथ, कुंणजे से बनाये भगवती स्वरूप को गाँव के धारे या मंगरे के पास सुला दिया गया।

कई क्षेत्रों में लगता है डाली कौथिग

गांव में मनाए जाने वाले नंदा देवी पाती पर्व के तहत 12 दिनों तक नंदा के प्रतीक स्वरूप पेड़ की शाखा पर फल लगाकर उसकी पूजा की जाती है। इसे डाली कौथिग कहा जाता है। नंदाष्टमी को देवी का पश्वा, जिस पर देवी अवतरित होती है, फलों को श्रद्धालुओं में वितरित कर देता है। साथ ही पेड़ की शाखा को विसर्जित कर उसका कैलास प्रवास मान लिया जाता है।

भगवती की छह अंगभूता देवियों में नंदा भी एक

बताया कि नंदा देवी समूचे गढ़वाल और हिमालय के अन्य भागों में जन सामान्य की लोकप्रिय देवी हैं। भगवती की छह अंगभूता देवियों में नंदा भी एक है। नंदा को नव दुर्गाओं में से भी एक बताया गया है। भविष्य पुराण में जिन दुर्गाओं का उल्लेख है उनमें महालक्ष्मी, नंदा, क्षेमकरी, शिवदूती, महाटूंडा, भ्रामरी, चंद्रमंडला, रेवती और हरसिद्धी हैं। शक्ति के रूप में नन्दा ही सारे हिमालय में पूजित है। नंदा के इस शक्ति रूप की पूजा गढ़वाल के अधिकांश क्षेत्रों में की जाती है।

पाती के शुभावसर पर नौटी में नंदा वन की स्थापना और वृक्षारोपण

पाती के अवसर पर नन्दा पाती के लिए भुट्टा (मुंगरी) का पौध दिया गया। वृक्षारोपण में 100 से अधिक पौध का रोपण किया गया, जिनमे तिलोज, देवदार, रिंगाल, चारा पत्ति के कई पौध का रोपण किया गया। वन पंचायत सरपंच पवन रावत ने कहा कि, नन्दा देवी गढ़वाल एवं कुमाऊं की आराध्य देवी हैं और नौटी से राजजात का शुभारम्भ होता है। नन्दा की याद में एवं नन्दा के प्रति अपनी आस्था एवं क्षेत्र की खुशहाली की कामना के लिए नन्दा वन क्षेत्र के हर गाँव और राजजात के हर पड़ाव में स्थापित करने की मुहिम चलाई जाएगी। इससे एक तरफ माँ के प्रति आस्था और पर्यावरण के प्रति अपनी जिमेदारी हर कोई समझ सके।

बहन को कैलाश विदा कर लाटू देवता मंदिर मे विराजमान

लाटू देवता को उत्तराखण्ड की अनन्य इष्ट देवी नंदा का धर्म भाई माना जाता है। इसलिए माँ नंदा को पूजे जाने वाले अनुष्ठानों में लाटू देवता की पूजा का भी विधान से की गई।  इस मौके पर श्री राजराजेस्वर लाटू देवता अपनी बहन माँ नंदा देवी को आपने ससुराल (कैलाश) की ओर प्रस्थान कर पौराणिक मंदिर मे विराजमान हो गए है। मान्यता है कि, श्री लाटू देवता स्वयं उनके साथ कैलाश के लिए जाते हैं।

जनश्रुति है कि, लाटू नंदा का भाई और मार्गदर्शक था और राक्षसों के साथ होने वाले युद्धों में लाटू ही उनका नेतृत्व करने वाला गण था। एक बार नन्दा को वाण पहुँचते हुए रात हो गयी और उन्होंने वहीं पर रुकने का फैसला किया। नंदा ने लाटू को एक बुढ़िया के घर पर रुकने को कहा। रात को लाटू द्वारा पानी मांगने पर बुढ़िया ने अपनी ख़राब सेहत का हवाला देकर उसे स्वयं ही पानी ले लेने को कहा। उसने यह भी बताया कि भीतर रखे घड़ों में से एक में पानी है और एक में शराब। लाटू ने गलती से शराब पी ली। नशे में गिरने की वजह से उनकी जीभ कट गयी और वे गूंगे हो गए। नंदा ने उनकी यह हालत देखकर कहा कि, अब से तुम इसी जगह पर आराम करोगे और तुम्हारी जगह तुम्हारा चिन्ह मेरी गवानी करेगा। जब भी मैं इस जगह से गुजरूंगी तुमसे मिले बगैर आगे के लिए नहीं जाया करुँगी।

ध्याण नंदा की विदाई पर खुदेड़ गीत

मां नन्दा भगवती की इस विदाई के दृश्य के बाद हर एक गांववासी खुद में कुछ खुदेड़ सा महसूस करता है। अनायास ही कानों में मां भगवती के लिए रचित एक गढ़वाली गीत की कुछ पंक्तियां गूंजने लगती हैं कि-

” सात-पांच बैणियूं मां, मी व्हेगी कुलाड़ी।

मी व्हेगी कुलाड़ी बाबा,मी व्हेगी कुलाड़ी।

कुई बैणी दीनी, नौ लाख डुमाग।

कुई बैणी दीनी, सौ लाख सलाण।

कुई बैणी दीनी, रौतेला कुमाऊं।

कुई बैणी दीनी, बाकेला बधाण।

मी कुलाड़ी दीनी बाबा, भंगफूका जोगी तै।

भंगफूका जोगी तै बाबा,भंगफूका जोगी तै।”

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